छत्तीसगढ़रायपुर

नक्सलवाद को सामाजिक-आर्थिक समस्या बताकर संरक्षण देने वाले बेनकाब हुए: सांसद बृजमोहन…

रायपुर – छह दशकों तक भारत की आंतरिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास यात्रा को चुनौती देता रहा नक्सलवाद आज अपने निर्णायक अवसान की अवस्था में पहुँच चुका है। यह केवल एक सुरक्षा सफलता नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय संकल्प की विजय है, जिसमें स्पष्ट नीति, अटूट राजनीतिक इच्छाशक्ति और केंद्र-राज्य के अभूतपूर्व समन्वय ने मिलकर एक जटिल और दीर्घकालिक समस्या का समाधान किया है।

नक्सलवाद का यह अवसान इस सत्य को पुनः स्थापित करता है कि भारत में बंदूक की शक्ति अंततः लोकतंत्र की सामूहिक शक्ति के आगे टिक नहीं सकती। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया—इसके पीछे दशकों का संघर्ष, अनगिनत बलिदान और एक ऐसी रणनीतिक निरंतरता रही है, जिसने अंततः इस चुनौती को निर्णायक रूप से परास्त किया।

इस ऐतिहासिक क्षण पर मैं उन सभी वीर जवानों को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ—केंद्रीय अर्धसैनिक बलों, कोबरा कमांडो, छत्तीसगढ़ पुलिस और स्थानीय सुरक्षाबलों के उन रणबाँकुरों को—जिन्होंने अपने सर्वोच्च बलिदान से इस संघर्ष को निर्णायक मुकाम तक पहुँचाया। यह विजय उनके अदम्य साहस और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण की अमिट गाथा है।

नक्सलबाड़ी से रेड कॉरिडोर तक: एक वैचारिक आंदोलन का हिंसक विस्तार

भारत में नक्सलवाद का उदय वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुआ, जिसकी वैचारिक जड़ें तत्कालीन सोवियत संघ और चीन की उग्र वामपंथी विचारधारा में थीं। अपनी विकास विरोधी छवि के कारण जब बंगाल में इस विचारधारा के प्रति विरोध पनपने लगा तो अपने विस्तार के लिए नक्सलवाद ने “सॉफ्ट टारगेट्स” की तलाश शुरू की—ऐसे क्षेत्र जहाँ शासन की पहुँच सीमित हो,

सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ अधिक हों और जनजागरूकता कम हो। देश के वनांचल, आदिवासी और खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र इस दृष्टि से सबसे आसान लक्ष्य थे। नक्सलवाद विस्तार की इसी रणनीति के तहत तथाकथित “रेड कॉरिडोर” विकसित हुआ, जो तिरुपति से पशुपति तक फैले विशाल भूभाग में फैल गया।

तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से घिरा छत्तीसगढ़, जिसका लगभग 42 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है, इस रेड कॉरिडोर का रणनीतिक केंद्र बन गया। पड़ोसी राज्यों से अपनी गतिविधियाँ सीमित रखने का अघोषित समझौता कर नक्सली अबूझमाड़ क्षेत्र में संगठित होते चले गए। अपनी दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण दशकों तक प्रशासनिक सर्वेक्षण से दूर रहा अबूझमाड़ नक्सलियों का सुरक्षित शेल्टर बन गया।

विचारधारा से विचलन: माओवाद से मनीवाद तक

समय के साथ नक्सलवाद ने अपनी मूल वैचारिक पहचान खो दी और एक हिंसक आर्थिक उगाही तंत्र में परिवर्तित हो गया। बस्तर और सरगुजा जैसे वनाच्छादित जनजातीय क्षेत्रों में नक्सलियों ने समानांतर सत्ता संरचना स्थापित कर दी, जहाँ तथाकथित “जन अदालतों” के माध्यम से भय आधारित नियंत्रण कायम किया गया।

छत्तीसगढ़ के खनिज सम्पन्न क्षेत्रों की खदानें, विद्युत परियोजनाएँ, तेंदूपत्ता व्यापार—सभी उनके लिए उगाही के स्रोत बन गए। सरकारी कर्मचारियों, व्यापारियों, ठेकेदारों और यहाँ तक कि पुलिस बलों से भी जबरन वसूली की जाने लगी । यह उगाही धीरे-धीरे इतनी बढ़ी कि छत्तीसगढ़ में इसका वार्षिक आंकड़ा हजारों करोड़ रुपये तक पहुँचने की चर्चा होने लगी।

सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस में यह विचारधारा समाप्त हो गई। चीन ने भी माओवाद की सशस्त्र संरचना को छोड़कर आर्थिक सुधारों पर आधारित पूंजीवादी कम्युनिज्म मॉडल को अपना लिया, लेकिन भारत में नक्सलवाद अपने मूल उद्देश्यों से भटककर लेवी वसूली और हिंसा फैलाने का टूल बन गया। नक्सलवाद के झंडाबरदारों ने विचारधारा को त्यागकर इसे अपने आर्थिक हितों की पूर्ति और आतंक फैलाने का साधन बना लिया।

नक्सलवाद के वैचारिक समर्थन की राजनीतिक पृष्ठभूमि

दुर्भाग्य से, कांग्रेस-नीत सरकारों के लंबे शासनकाल में नक्सलवाद के प्रति स्पष्ट और कठोर नीति का अभाव रहा क्योंकि उस दौर में केंद्र और कई राज्यों में भी वामपंथी पार्टियां कांग्रेस के सहयोगी की भूमिका में थीं। सत्ता के लिए वामपंथ के साथ कांग्रेस की राजनीतिक निकटता का परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार करने की बजाय इसे सामाजिक-आर्थिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत कर वैधता प्रदान करने की नीति हावी हो गई।

उस दौर में प्रशासनिक तंत्र के भीतर भी यह वैचारिक भ्रम दिखाई देता था। नक्सलवाद को सामाजिक समता पाने का वर्ग संघर्ष ठहराने के दृष्टिकोण से प्रशिक्षित किए गए आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की नीतियाँ भी नक्सलवाद के विरुद्ध कठोर होने के बजाय सहानुभूतिपूर्ण हो गई थीं।

इस ढुलमुल नीति का परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद देश के 12 राज्यों के लगभग 180 जिलों में फैल गया और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद से ही प्रदेश के समग्र विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन गया।

राष्ट्रीय चेतना का उदय: मेरे प्रारंभिक अनुभव

छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहते हुए मुझे बस्तर क्षेत्र में काम करने का अवसर मिला जहां नक्सलवाद रूपी दैत्य से मेरा प्रथम साक्षात्कार हुआ और यह आभास भी हुआ कि दंडकारण्य में इस दैत्य का दमन केवल हथियारों से नहीं किया जा सकता।

नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष की भूमि तैयार करने के लिए इस क्षेत्र में वैचारिक जनजागरण की नितांत आवश्यकता थी और इसलिए जनजातीय समाज के बीच राष्ट्रीयता का अलख जगाने के प्रकल्प में मैंने भी अपनी भागीदारी निभाई।

1990 के दशक में स्वर्गीय सुंदरलाल पटवा जी के नेतृत्व में रायपुर के पुराने कमिश्नर कार्यालय के बीटीआई कम्युनिटी परिसर में आयोजित बैठक में पहली बार यह निर्णय लिया गया कि नक्सलवाद के विरुद्ध संघर्ष को राष्ट्रीयता के व्यापक संदर्भ में लड़ा जाएगा। यही वह निर्णायक मोड़ था जब नक्सलवाद की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के परिप्रेक्ष्य में देखा गया।

जब हुई छत्तीसगढ़ विधानसभा की गोपनीय बैठक

वर्ष 2003 से 2006 के बीच, जब मुझे मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह जी की सरकार में छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री के रूप में कार्य करने का उत्तरदायित्व मिला, तब प्रदेश में पहली बार नक्सलवाद के विरुद्ध एक ठोस, नीतिगत और समन्वित अभियान प्रारंभ किया गया। “ज्वाइंट एफर्ट, ज्वाइंट कमांड और ज्वाइंट पॉलिसी” के सिद्धांत पर केंद्र और राज्य के बीच समन्वय स्थापित करने के प्रयास किए गए।

तात्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील जी के साथ इस विषय पर मेरी कई गंभीर और विस्तृत मंत्रणाएँ हुई थीं।
उस दौर में इस विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए देश के इतिहास में पहली बार विधानसभा में गोपनीय बैठकों का आयोजन किया गया, ताकि लोग बिना किसी भय के खुलकर अपनी बात रख सकें।

तात्कालीन स्पीकर प्रेम प्रकाश पांडेय जी की अध्यक्षता में आयोजित की जाने वाली इन बैठकों से अधिकारियों और पत्रकार साथियों को भी दूर रखना जरूरी हो गया था। इन मंत्रणाओं के परिणामस्वरूप बनी रणनीति के तहत तात्कालीन डीजीपी ओपी राठौड़ के नेतृत्व में कई अभियान चलाए गए और इसी क्रम में सलवा जुडूम जैसे जनअभियान की शुरुआत हुई।

सलवा जुडूम: जनभागीदारी का ऐतिहासिक अध्याय

हमारे समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अशिक्षा, अज्ञानता और दुष्प्रचार के कारण स्थानीय समाज का एक बड़ा हिस्सा नक्सलवाद के प्रति सहानुभूति रखता था। इस स्थिति को बदलने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाया गया। स्कूलों, महाविद्यालयों और छात्रावासों में पर्चे और साहित्य वितरित किए गए। घर-घर जाकर नक्सलवाद की वास्तविकता को उजागर किया गया। इस अभियान में दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसे संस्थानों से जुड़े राष्ट्रवादी विचारकों और छात्रों का भी सहयोग लिया गया।

जनजातीय समाज को यह समझाया गया कि नक्सल नेतृत्व में स्थानीय छत्तीसगढ़ी आदिवासियों की भागीदारी शून्य है। जल जंगल जमीन के नारों की आड़ में हमारे भोले-भाले आदिवासियों का उपयोग केवल एक साधन के रूप में किया जा रहा था। यह भी सामने आया कि नक्सलियों के द्वारा आदिवासी युवतियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था, उन्हें शोषण का शिकार बनाया जाता था, उन्हें विवाह तक नहीं करने दिया जाता और सामान्य सामाजिक जीवन जीने तक से वंचित रखा जाता था।

इन सभी कड़वी सच्चाइयों के उजागर होने से आई जनजागृति का परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद को मिलने वाला सामाजिक समर्थन कमजोर पड़ने लगा। जब नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा बने सलवा जुडूम के अगुआ “सलवा जुडूम” केवल एक सरकारी पहल नहीं थी, बल्कि आदिवासी समाज के भीतर से उठा एक स्वाभाविक जनआंदोलन था, जिसने पहली बार सही मायने में नक्सलवाद को चुनौती दी।

तात्कालीन नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा जी ने न केवल इस अभियान को पुरजोर समर्थन दिया बल्कि इसे जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई। इस संघर्ष से जुड़े रहने के कारण अंततः उन्हें अपने प्राणों की आहुति तक देनी पड़ी—जो इस आंदोलन की गंभीरता और बलिदान की पराकाष्ठा का साक्षात प्रमाण है। नक्सलवाद ने हमें झीरम जैसे दंश दिए जिसमें प्रदेश के अग्रणी नेता काल कलवित हो गए।

सलवा जुडूम जनआंदोलन को अगर व्यापक संस्थागत समर्थन मिला होता, तो निश्चित ही नक्सलवाद का उन्मूलन उसी दौर में हो जाता, पर वैधानिक संस्थानों में काम करने वाले कई लोगों की सलवा जुडूम के खिलाफ लामबंदी, अर्बन नक्सली बुद्धिजीवियों के वैचारिक विरोध और केंद्र सरकार के नीतिगत असमंजस के कारण यह अवसर पूर्ण रूप से साकार नहीं हो सका।

समन्वित नेतृत्व से निर्णायक परिवर्तन वास्तविक परिवर्तन तब आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जी के नेतृत्व में नक्सलवाद के विरुद्ध स्पष्ट, कठोर और समन्वित नीति अपनाई गई। नक्सलवाद को महज कानून-व्यवस्था की समस्या न मानकर, राष्ट्र की एकता, विकास और लोकतांत्रिक ढांचे के लिए गंभीर चुनौती मानते हुए नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए समयबद्ध रणनीति तैयार की गई।

केंद्र और राज्य सरकारों के सशक्त समन्वय के परिणामस्वरूप दिसंबर 2023 से मार्च 2026 के बीच सुरक्षा बलों ने लगातार सटीक और प्रभावी कार्रवाई करते हुए सैकड़ों कुख्यात नक्सलियों को निष्क्रिय किया, हजारों को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियाँ सुनिश्चित कीं। लैंड माइंस का व्यापक निष्क्रियकरण हुआ और भारी मात्रा में हथियार बरामद किए गए।

केंद्र और राज्य के समन्वित दृष्टिकोण और साझे प्रयासों से छह दशक पुराने नक्सलवाद के नासूर को जड़ से समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ

नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ की बुनियाद पर विकसित छत्तीसगढ़ गढ़ने का संकल्प वर्ष 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए अब हमें नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ को विकसित छत्तीसगढ़ में गढ़ने के लिए दृढ़ संकल्पित होना पड़ेगा। जिस प्रकार आर्टिकल 370 के उन्मूलन से जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति और राष्ट्रीय एकीकरण का आधार बना, उसी प्रकार नक्सलवाद का समापन छत्तीसगढ़ के लिए एक नए युग का द्वार खोल रहा है।

जिन क्षेत्रों में कभी शासन की पहुँच सीमित थी, वहाँ अब सड़कों का जाल बिछ रहा है, मोबाइल नेटवर्क स्थापित हो रहे हैं, बैंकिंग सेवाएँ सुलभ हो रही हैं और शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाएँ तेजी से विस्तार पा रही हैं। बस्तर और आसपास के क्षेत्रों में जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह केवल भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक भी है। जहाँ कभी गनतंत्र का साया था, वहाँ आज जनतंत्र विश्वास और विकास के साथ स्थापित हो रहा है।

अब चुनौती इस सफलता को स्थायी बनाने की है—ऐसी सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक संरचना खड़ी करने की, जहाँ किसी भी प्रकार की हिंसक विचारधारा को पनपने का अवसर ही न मिले। आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं के पुनर्वास, कौशल विकास, शिक्षा और रोजगार के अवसरों को प्राथमिकता देना आवश्यक है, ताकि वे पुनः हिंसा के रास्ते पर न लौटें।

बुलेट पर बैलेट की निर्णायक विजय

नक्सलवाद पर यह विजय केवल एक आंतरिक सुरक्षा अभियान की सफलता नहीं है, बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। यह उस निर्णायक परिवर्तन का संकेत है, जहाँ भय की राजनीति को विश्वास की शक्ति ने प्रतिस्थापित किया है और जहाँ बंदूक के साये में जी रहे समाज ने विकास और सहभागिता के मार्ग को अपनाया है।

जो लोग बंदूक और गोलियों के दम पर भय के माध्यम से छत्तीसगढ़ में छद्म राज्य की कल्पना करते थे उनका अंत हुआ और लोकतंत्र की विजय हुई। बुलेट पर बैलेट की जीत हुई। देश की जनता, छत्तीसगढ़ की जनता और विशेषकर बस्तर की जनता को इस ऐतिहासिक विजय की ह्रदय से शुभकामनाएं।

संपूर्ण खबरों के लिए क्लिक करे

https://jantakikalam.com 

Related Articles

Leave a Reply

Back to top button