
दुर्ग – दशकों तक दुर्गम पहाड़ियों, घने जंगलों और सीमित संसाधनों के कारण विकास की मुख्यधारा से दूर रहा बस्तर आज नई दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। इस परिवर्तन के केंद्र में है दल्लीराजहरा-रावघाट रेल परियोजना, जिसे सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र ने भारतीय रेलवे के साथ मिलकर केवल एक औद्योगिक आवश्यकता के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास के दीर्घकालिक आधार के रूप में आगे बढ़ाया। वर्ष 2008 में इस परियोजना के लिए हुए एमओयू के साथ जिस सफर की शुरुआत हुई थी, वह आज बस्तर के सामाजिक और आर्थिक बदलाव की नई कहानी लिख रहा है।
करीब 95 किलोमीटर लंबी यह रेल परियोजना सामान्य निर्माण कार्य नहीं थी। नक्सल प्रभावित और अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र से गुजरने वाली इस लाइन के निर्माण में सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती रही। रेल लाइन और खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए वर्ष 2012 में गृह मंत्रालय के समन्वय से दो-दो बटालियन सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, जिनमें रेलवे ट्रैक की सुरक्षा के लिए एसएसबी तथा खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बीएसएफ की बटालियनें शामिल थीं।
गृह मंत्रालय के निर्देशानुसार दल्लीराजहरा से रावघाट तक के आंतरिक क्षेत्रों में सेल द्वारा 4 अर्ध-स्थायी तथा 21 स्थायी सुरक्षा शिविरों का निर्माण कराया गया, जिस पर सेल द्वारा 180 करोड़ रुपये से अधिक की राशि व्यय की गई। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सुरक्षा चुनौतियों और बीच-बीच में हुई घटनाओं के बावजूद परियोजना का कार्य लगातार आगे बढ़ता रहा।
रेलवे निर्माण कार्य भारतीय रेलवे द्वारा सेल के वित्तीय सहयोग से किया जा रहा है, जबकि निर्माण एजेंसी रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) है। रेल लाइन निर्माण की अनुमानित लागत लगभग 1854 करोड़ रुपये है, जिसमें से सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र अब तक लगभग 1720 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है। इसके अतिरिक्त रेलवे लाइन के विद्युतीकरण कार्य के लिए भी संयंत्र द्वारा लगभग 180 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि व्यय की गई है।
वर्ष 2010 में प्रारंभ हुए इस कार्य में अप्रैल 2026 तक रावघाट स्टेशन भवन, यात्री सुविधाओं तथा सिग्नलिंग एवं दूरसंचार कार्य को छोड़कर अधिकांश निर्माण पूरा किया जा चुका है। कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) निरीक्षण सहित पूर्ण कमीशनिंग जून 2026 में प्रस्तावित है।
20 मई 2026 को रावघाट रेलखंड पर इंजन की सफल रोलिंग इस परियोजना की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आई है। इसके साथ ही रावघाट माइंस से सीधे रेल रेक संचालन का मार्ग लगभग प्रशस्त हो गया है और आगामी कुछ सप्ताहों में रावघाट से रेक डिस्पैच प्रारंभ होने की संभावना है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि वर्षों के सतत प्रयास, समन्वय और कठिन परिस्थितियों में किए गए कार्य का परिणाम मानी जा रही है।
इस परियोजना का प्रभाव अब केवल औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। वर्ष 2022 में दल्ली राजहरा से तरोकी तक यात्री ट्रेन सेवा शुरू होने के बाद बस्तर अंचल के लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार के नए रास्ते खुले हैं। आदिवासी समाज के युवाओं के लिए अब दुर्ग, भिलाई और देश के अन्य बड़े शहरों तक पहुंच पहले की तुलना में अधिक सहज हो गई है। स्थानीय नागरिकों के लिए यह रेल लाइन केवल परिवहन का माध्यम नहीं, बल्कि नई संभावनाओं का द्वार बनती जा रही है।
आज भिलाई इस्पात संयंत्र रावघाट स्टेशन को भी भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित कर रहा है। स्टेशन में यात्रियों के लिए तीन प्लेटफॉर्म तथा लौह अयस्क एवं सामग्री परिवहन हेतु एक पृथक गुड्स प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है। वर्तमान में लौह अयस्क का परिवहन सड़क मार्ग से अंतागढ़ रेलवे साइडिंग तक तथा वहां से रेल मार्ग द्वारा संयंत्र तक किया जा रहा है। पहली रेक 9 सितंबर 2022 को लोड की गई थी और वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 6000 टन लौह अयस्क अंतागढ़ साइडिंग तक पहुंचाया जा रहा है।
अक्टूबर 2026 से रावघाट से सीधे रेक संचालन प्रारंभ होने की संभावना है, जिससे प्रतिदिन लगभग चार रेक यानी 15 हजार टन लौह अयस्क परिवहन संभव हो सकेगा। वर्ष 2025-26 में अंतागढ़ साइडिंग से 1.74 मिलियन टन आयरन ओर प्राप्त हुआ है, जबकि वर्ष 2026-27 में अंतागढ़ और रावघाट साइडिंग के माध्यम से अतिरिक्त 4 से 5 मिलियन टन लौह अयस्क प्राप्त होने का अनुमान है। परियोजना पूर्ण होने के बाद प्रतिवर्ष 6 से 7 मिलियन टन लौह अयस्क की आपूर्ति संभव होगी।
यह परियोजना भिलाई इस्पात संयंत्र की भविष्य की उत्पादन योजनाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में संयंत्र की लौह अयस्क आवश्यकता लगभग 32 हजार टन प्रतिदिन है। वहीं हॉट मेटल उत्पादन को 6.5 एमटीपीए से बढ़ाकर 7.5 एमटीपीए तथा वर्ष 2031 तक 10.5 एमटीपीए विस्तार लक्ष्य तक पहुंचाने की योजना पर कार्य किया जा रहा है। इस दृष्टि से रावघाट परियोजना संयंत्र की दीर्घकालिक कच्चा माल सुरक्षा का मजबूत आधार बन रही है।
लेकिन इस परियोजना का वास्तविक महत्व केवल लौह अयस्क परिवहन या औद्योगिक विस्तार तक सीमित नहीं है। भिलाई इस्पात संयंत्र ने इस पहल के माध्यम से बस्तर के भीतरी क्षेत्रों की पहुंच, संपर्क और संभावनाओं को नई दिशा दी है। रावघाट परियोजना आज उस बदलते बस्तर का प्रतीक बनती जा रही है, जहाँ कभी विकास की राहें कठिन मानी जाती थीं। यह परियोजना दर्शाती है कि जब औद्योगिक विकास और सामाजिक सरोकार साथ चलते हैं, तब रेल की पटरियाँ केवल दूरी नहीं घटातीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य को नई गति देती हैं।




