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समाजवाद के मुखर स्वर: स्व. गुलाब सिंह, जिन्होंने जीवन से ज्यादा समाज को दिया…

ब्रिटेन के सबसे ज्यादा चर्चित चर्चित प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल ने कहा था कि ” “वी मेक ए लिविंग बाई व्हाट वी गेट , बट वी मेक ए लाइफ बाई व्हाट वी गिव ” सरल हिन्दी में इसका भावार्थ यह है कि हम जो कमाते या पाते है उससे हमारा जीवन चलता है लेकिन हम जो देते है उससे हमारा जीवन सार्थक बनता है.

इस बात को पैमाना मान कर कसौटी पर कसा जाए तो छत्तीसगढ़ के समाजवादी नेता स्व. गुलाब सिंह सौ टका खरे उतरते है . जिन्होंने अपने जीवन में जितना पाया उससे ज्यादा समाज को दिया है. औद्योगिक नगरी भिलाई के कर्मी के रूप में कर्तव्य के प्रति आजीवन ईमानदार रहे स्व. गुलाब सिंह, अपने मानवीय दायित्वों के प्रति भी उतने ही वफादार थे.

समाजवादी आंदोलन के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित स्व. गुलाब सिंह के हृदय में प्रख्यात समाजवादी संत लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय संरक्षक श्री रघु ठाकुर के लिए गहरी आस्था थी. विषमताओं को मिटाने और जनाधिकार बहाली के उद्देश्य छत्तीसगढ़ में होने प्रत्येक आंदोलन में , व्यवस्था के दमनात्मक हथकंडों से बेखौफ स्व. गुलाब सिंह बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी करते थे . उन्हें नौकरी जाने, जेल जाने, और अन्य यातनाओं से कभी भी कोई डर नहीं लगा.

बाबू साहब के नाम से प्रसिद्ध स्व. गुलाब सिंह की सिंह गर्जना, आंदोलनों में जान फूंक देती थी क्योंकि उनके साथियों को विश्वास था कि वक्त आने पर प्राण भले न त्यागने पड़े, बाबू साहब कदम कभी नहीं डगमगाएंगे. बाबू साहब के संघर्ष की यादें आज भी लोगो को प्रेरणा देती है.

आज जब , जन, जल , जंगल, जमीन जो कभी छत्तीसगढ़ की पहचान हुआ करते थे, आम जन से छीने जा रहे है , जन से रोजगार , आदिवासी को जल, जंगल , जमीन , से बेदखल किया जा रहा है. डॉ लोहिया द्वारा बोया बीज , श्री रघु ठाकुर द्वारा पोषित पौधा आज विशाल काय वृक्ष बन चुका है.

लेकिन इजारेदारो की हवस उसे काटने पर आमादा है, बस्तर से सरगुजा तक के घने वनों जारी निर्मम कटाई, आदिवासी घरों और छोटे कारोबारियों तथा निर्धन जनों की बेदखली और भूगर्भ में छुपी बेशकीमती की लूट कभी शांति के टापू के नाम से मशहूर छत्तीसगढ़ में चिंता की सुलगती आर्थिक और सामाजिक विषमता की आग के बावजूद छाई खामोशी, बरबस स्व. गुलाब सिंह जैसे जियालों की कमी का एहसास कराती है.

और लोगो को लगता है कि उनके बीच उनके बाबू साहब होते तो झंडे लेकर लोगों के बीच जन सम्मान की रक्षा के लिए मैदान में होते .और जड़ व्यवस्था को कुंभकर्णी नींद से जागने के लिए बराबरी और हकदारी का स्वर , सड़कों पर मुखर होता. यूं स्व. गुलाब सिंह को गुजरे लंबा अरसा हो गया पर आज भी लोग उन्हें उसी श्रद्धा से याद करते है जैसे पहले करते थे.

और करे भी क्यों न, स्व. गुलाब सिंह दोस्तो के दोस्त थे. भले बुरे हर वक्त साथ खड़े रहते थे . उनकी बरसी पर, जिनके हृदय में उनके लिए अथाह सम्मान है उन सभी लोगों की ओर से , विनम्र श्रद्धांजलि.

अशोक पंडा- वरिष्ठ पत्रकार

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