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नेहरु आर्ट गैलरी में गोपी कृष्ण सोनी द्वारा आदिवासी संस्कृति पर केन्द्रित फोटो की एकल प्रदर्शनी उद्घाटित…

सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसंपर्क विभाग द्वारा संचालित, इंदिरा प्लेस, सिविक सेंटर स्थित नेहरू आर्ट गैलरी में, विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर पंडरिया, कवर्धा के गोपी कृष्ण सोनी द्वारा, आदिवासी संस्कृति पर केन्द्रित फोटो की एकल प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन 8 अगस्त, 2024 (गुरुवार) को संध्याकाल मुख्य अतिथि, भिलाई इस्पात संयंत्र के कार्यपालक निदेशक (मानव संसाधन) पवन कुमार द्वारा किया गया।

इस प्रदर्शनी का अवलोकन करने के पश्चात कार्यपालक निदेशक (मानव संसाधन) पवन कुमार ने अवलोकन पुस्तिका में लिखा “गोपी कृष्ण द्वारा लिए गये फोटो प्रदर्शनी को देखने का अवसर प्राप्त हुभा। उन्होने अपने कैमरे से आदिवासी संस्कृति को बखूबी उजागर किया है। प्रदर्शनी यह दर्शाता है कि गोपी कृष्ण को आदिवासी संस्कृति की बहुत अच्छी समझ है और उनकी तस्वीरो से अन्य लोगों को भी आदिवासी संस्कृति के बारे मे जागरूक होने का अवसर मिलता है।”

पवन कुमार ने उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएँ भी दी। उन्होंने गोपी कृष्ण सोनी से आदिवासी संस्कृति पर केन्द्रित फोटो तथा और प्रत्येक तस्वीरों के पीछे छिपी संस्कृति और उसके अर्थ के बारे में चर्चा भी की। उन्होंने इस प्रदर्शनी में विशेष रूचि लेते हुए इसका भरपूर आनंद उठाया।

इस प्रदर्शनी में मुख्य महाप्रबंधक (मानव संसाधन) संदीप माथुर, ऑफिसर्स एसोशियेशन के अध्यक्ष एवं सेफी के चेयरमैन एन के बंछोर, महासचिव (ओए) परविंदर सिंह, महाप्रबंधक (ईडी-एचआर, सचिवालय) एच शेखर, महाप्रबंधक (एचआर, आईआर एंड सीएलसी) जे एन ठाकुर, महाप्रबंधक (एचआर, आईआर एंड सीएलसी) विकास चंद्रा, महाप्रबंधक (जनसम्पर्क) प्रशांत तिवारी, महाप्रबंधक (सम्पर्क प्रशासन) सौमिक डे, पूर्व महाप्रबंधक (जनसम्पर्क) एस के दरिपा एवं भिलाई इस्पात संयंत्र के अन्य सदस्यगण उपस्थित थे। साथ ही गोपी कृष्ण और उनका परिवार, आर्ट क्लब के सचिव एस डी बर्मन, आर्ट क्लब के सदस्य ईश्वर पटेल सहित अन्य सदस्यगण, फोटोग्राफर एवं वीडियोग्राफर, कलाकार तथा इस्पात नगरी भिलाई के आम नागरिक उपस्थित थे।

उद्घाटन समारोह में फोटोग्राफर के परिवारजनों ने कार्यपालक निदेशक (मानव संसाधन) पवन कुमार को आदिवासी संस्कृति से प्रेरित कलगी और पागा पहना कर उनका स्वागत किया। उद्घाटन कार्यक्रम में प्रदर्शित तस्वीरों में जिन आदिवासी बैगा जनजाति को दिखाया गया है, उनमे से ही आये कुछ कलाकारों ने अपना पारम्परिक लोकनृत्य भी प्रस्तुत किया, जो आकर्षण का मुख्य केंद्र रहा। प्रदर्शनी में लगाये गए फोटो में आदिवासी संस्कृति, उनकी परम्परा, रहन-सहन, तीज-त्यौहार, आभूषण आदि को दर्शाया गया है।

इस दौरान आदिवासी बैगा जनजाति कलाकारों के मुखिया और राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले बैगा जनजाति के दयाराम राठुलिया ने बताया कि वे मध्यप्रदेश डिंडोरी जिले से हैं। उद्घाटन समारोह में प्रस्तुत नृत्य को बैगा करमा के नाम से जाना जाता है, जिसे सावन के माह में मनाया जाता है। इस तीज-त्यौहार की शुरुआत हरियाली के दिन से की जाती है, जिसमें बैगा जनजाति के लोग जंगल जाते हैं और वहाँ के विशेष वृक्षों से कुछ पत्ते, डारा, भंवरपाल, बांस का पत्ता आदि लाते हैं।

घरों और खेतों में जागरण करते हैं, देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और ये नृत्य करते हैं। उन्होंने अपने परम्पराओं, तीज-त्योहारों, नृत्य आदि के बारे में जानकारी साझा की। उन्होंने गोपी कृष्ण सोनी के बारे में बताते हुए कहा कि वे हमसे काफी लंबे समय से जुड़े हुए हैं और बैगा जनजाति समूह के जन्म संस्कार, गोदना, विवाह संस्कार, मृत्यु संस्कार आदि पर फोटोग्राफी का कार्य करते हैं। भारत सरकार द्वारा विशेष संरक्षित जनजातियों को आगे बढ़ाने के लिए कई प्रकार की योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिसके तहत आदिवासी बैगा जनजाति को भी राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र का दर्जा प्राप्त है।

गोपी कृष्ण सोनी, ग्राम नेऊर, पंडरिया, जिला कबीरधाम के निवासी हैं, और पेशे से शिक्षक हैं और स्कूल शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। गोपी कृष्ण सोनी एक प्रसिद्ध लेखक स्व. हरिहरण द्वारा लिखे गए छत्तीसगढ़ की मिथक कथाएं में अपना लेख प्रकाशित किया है। नरेश विश्वा पर लिखे गए लोककथा पर फोटोग्राफी संलग्न की है। बोडा आदिवासीयों (उड़िसा) की फोटोग्राफी की है।

गोपी कृष्ण सोनी ने छत्तीसगढ़ आदिम जनजाति के मासिक पत्रिकाओं, अर्द्ध वार्षिक बुलेटिन में लेखन और फोटोग्राफी आदि का कार्य किया है। उन्होंने देश की राजधानी दिल्ली में बैगा आदिवासी नृत्य दल की प्रस्तुति का नेतृत्व किया है। बैगा जनजाति की जीवनशैली पर आधारित फोटोग्राफी, गहने, औजार और कलाकृतियों का संग्रहण किया है। वर्तमान में जनजातिय लोककला एवं बोली विकास अकादमी, भोपाल (मध्य प्रदेश) के साथ गोपी कृष्ण सोनी का शोधकार्य और फोटोग्राफी जारी है।

हर साल 9 अगस्त के दिन विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। यह पूरी तरह से विश्व के सभी आदिवासियों को समर्पित हैं। इस अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम के माध्यम से दुनियाभर में आदिवासियों और समाज में उनके द्वारा दिए गए योगदान का सम्मान किया जाता है। इस दिन आदिवासी समुदाय के अधिकारों की सुरक्षा पर भी ध्यान आकर्षित किया जाता है। दुनिया में आदिवासी समुदाय की आबादी कई करोड़ है, जिसमें अलग-अलग आदिवासी समुदाय और उनकी हजारों बोलियां हैं। इसके बावजूद आदिवासियों को अपने अस्तित्व, संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

इसी संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 9 अगस्त 1982 को आदिवासियों के हित में एक विशेष बैठक आयोजित की गई थी। इसे मानाने की सबसे पहली शुरुआत सयुंक्त राज्य अमेरिका ने 1994 में की थी, तब से जागरूकता बढ़ाने, दुनियाभर के आदिवासी समुदाय के अधिकारों की रक्षा, उनकी सुरक्षा और जनजातीय समाज के उत्थान के लिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। यह प्रदर्शनी 10 अगस्त, 2024 तक प्रतिदिन संध्या 5.30 बजे से रात्रि 8.30 बजे तक आम जनता के दर्शनार्थ खुली रहेगी।

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