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रेप केस में आया अदालत का फैसला, पूरा मामला हैरान करने वाला…

नई दिल्ली: दिल्ली की अदालत ने एक शख्स को रेप के आरोप से बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के खुद के मटीरियल महिला के बयान को गलत बनाते हैं और आरोपी के खिलाफ कोई शक पैदा नहीं करते है। आरोपी के वकील सुमीत वर्मा ने दावा किया, ‘सीआरपीसी की धारा 164 के तहत पीड़िता द्वारा पुलिस के साथ-साथ मजिस्ट्रेट के समक्ष रेप की स्पष्ट शिकायत के बावजूद गुण-दोष के आधार पर बलात्कार के मामले में आरोपमुक्त करने का यह आदेश दस लाख मामलों में से एक जैसा है।’

इससे पहले, वर्मा ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अंजनी महाजन की अदालत के समक्ष बताया था कि यह केस 16 मार्च, 2018 को शिकायतकर्ता के खिलाफ आरोपी द्वारा दर्ज किए गए चोरी के मामले का प्रतिवाद था। महिला ने आरोप लगाया कि 15 मार्च, 2018 को जब वह घरेलू सहायिका के तौर पर काम करने के लिए आरोपी के घर गई थी तो शख्स ने उसके साथ बलात्कार किया। हालांकि, वह अगले दिन दोबारा आरोपी के घर गई और झगड़े के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

अदालत ने कहा कि पुलिस को पहली कॉल आरोपी द्वारा की गई थी। महिला द्वारा की गई पीसीआर कॉल में भी रेप की नहीं छेड़छाड़ की जानकारी दी गई थी। इसमें आगे कहा गया कि 16 मार्च, 2018 को घर जाने वाले पुलिस अधिकारी ने पाया कि आरोपी पुरुष और महिला कुछ पैसे को लेकर झगड़ रहे थे। उस समय महिला ने दुष्कर्म का आरोप नहीं लगाया था। बाद में महिला के घर से 12,900 रुपये बरामद हुए, जिसका वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी।

दर्ज बयान के मुताबिक, महिला आरोपी का नाम नहीं जानती थी। उसने यह भी दावा किया कि जब उसने उसकी ओर से एटीएम से कुछ पैसे निकालने से इनकार कर दिया तो उसने उसके साथ बलात्कार किया। अदालत ने कहा कि पुलिस शिकायत करने की तारीख और तरीके को लेकर भी दोनों वर्जन में विरोधाभास हैं। अदालत ने कहा कि मूल शिकायत के अनुसार, बलात्कार की कथित घटना 15 मार्च, 2018 को हुई थी। हालांकि, महिला ने उस दिन 100 नंबर पर कोई शिकायत/कॉल नहीं की। वह अगले दिन दोबारा आरोपी के घर गई और कचरा उठाने के ‘मामूली मुद्दे’ पर झगड़ा किया। जिसपर आरोपी ने दुर्व्यवहार किया और फिर उसने पुलिस से शिकायत की, जो वास्तव में बाद में लिया गया विचार प्रतीत होता है।

अदालत ने 6 दिसंबर के अपने आदेश में कहा कि उस व्यक्ति के खिलाफ आरोप तय करने का कोई ‘गंभीर संदेह’ नहीं है। इसमें आगे कहा गया कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने जून 2018 में आरोपी को अग्रिम जमानत देते हुए कहा था कि शिकायत की कई पहलुओं पर गहन जांच करने की जरूरत है। इसमें कहा गया है कि शिकायतकर्ता ने झूठी शिकायत दर्ज की और मेडिकल जांच कराने से इनकार कर दिया।

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