
दुर्ग / अब युकितियुक्तकरण का पूर्णतः विरोध किया जाये,क्योंकि न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी हमें इसी कहावत को चरितार्थ करना चाहिये। क्योंकि ये नियम बन गया है कि सरकार हमारे हित का काम नहीं कर पाती तो सरकार अपने पिटारे से कोई न कोई गोटी निकाल कर हम शिक्षकों को मुख्य मुद्दे से भटकाकर कोई संकट पैदा करती है।
जैसे अभी हमारेहित का काम था प्रमोशन देना जिससे सारे सांथियों को फायदा होता तथा अतिशेष शिक्षक कंही कंही ही बंचते जिनका समायोजन भी उनकी संस्था के आसपास ही हो जाता। किंतु नकारा सरकार प्रमोशन तो नही देपाई तो नया सगूफा छोड़ दी युक्तियुक्तकरण के रूप में जिससे शिक्षक मानसिक रूप से परेशान रहें तथा प्रमोशन की बात ही न कर पाये।
ऐसे में सरकार ने एक तीर से दो निशाना साध लिया क्योंकि वित्त मंत्री जी बजट का रोना रो रहे हैं ऐसे में चार हजार स्कूल यदि मर्ज हो जाते हैं तो उन चार हजार स्कूलों के सन् २००८ के सेटअप के अनुसार लगभग १२००० बारह हजार पद तो स्वमेव ही समाप्त हो गये। सोंचिये बेरोजगारों के लिये ये कितना बड़ा अभिशाप होगा। बेरोजगारों के सांथ सांथ इन चार हजार संस्थाओं में शिक्षक प्रधानपाठक पद पर प्रमोशन लेकर जाते। तो ये प्रमोशन के चार हजार पद भी समाप्त हो गये। ये तो जिंदगी भर नौकरी करने वाले शिक्षक के लिये कुठाराघात से कम नही।
तीसरा मुद्दा उन चार हजार स्कूलों के रसोइये और स्वीपर जो बेचारे अत्यल्प मजदूरी पर अपना समय स्कूल को दे रहे हैं वे पूर्णतः बेरोजगार हो जायेंगे। जो गरीब पालक बच्चों को शिक्षा पाने स्कूल भेजते हैं यदि शाला में सिर्फ दो शिक्षक रह गये तो वे सिर्फ मध्यान्ह भोजन के लिये बच्चों को स्कूल भेजेंगे पूरी शिक्षा व्यवस्था इस युक्तियुक्तकरण के कारण चरमरा जायेगी। इसलिये युक्तियुक्तकरण पूरी तरह से बंद हो आपको ज्यादा ही चिंता है तो नयी भर्ती कर शिक्षक विहीन और एकल शिक्षकीय स्कूलों में आप शिक्षक भेजिये।
आपकी सरकार हमने किसलिये बनाई है। जवाब दीजिये।
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