
कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव नजदीक हैं। इसी बीच मनीष तिवारी, आनंद शर्मा, कार्ति चिदंबरम और शशि थरूर जैसे नेता चुनाव में पारदर्शिता की बात कह चुके हैं। अब पार्टी के पुरान नेताओं की इस मांग ने एक बार फिर 22 साल पहले हुए अध्यक्ष के चुनाव की याद को ताजा कर दिया है।
उस दौरान कांग्रेस की मौजूदा अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी से अब अलग हो चुके जितिन प्रसाद मैदान में थे। दोनों के बीच चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता के चलते बड़ा तनाव खड़ा हो गया था।
साल 2000 में क्या हुआ था –
2000 में आखिरी बार कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव आयोजित किए गए थे। तब प्रसाद खेमे ने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। समूह की तरफ से प्रदेश कांग्रेस कमेटी डेलीगेट्स की सूची में हेराफेरी के भी आरोप लगाए गए थे। प्रसाद के समर्थकों ने आरोप लगाए थे कि मतदाता सूची में फर्जी नाम भी शामिल हैं।
वहीं, यह भी दावा किया गया था कि उन्हें इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्यों के पते नहीं दिए गए थे, जिसके चलते उनके समर्थन जुटाने की कोशिशें प्रभावित हुई थी। खास बात है कि तब चुनाव में उतरने से पहले ही प्रसाद ने पार्टी की सेंट्रल इलेक्शन अथॉरिटी (CEA) को पत्र लिखा था, जिसमें कांग्रेस प्रतिनिधियों की सूची जारी नहीं करने को लेकर सवाल उठाए गए थे।
अब मौजूदा हाल जानें –
कांग्रेस के ‘जी 23’ समूह में शामिल रहे तिवारी ने कहा, ‘यह 28 प्रदेश कांग्रेस कमेटी और आठ क्षेत्रीय कांग्रेस कमेटी का चुनाव नहीं है। कोई क्यों पीसीसी के कार्यालय जाकर पता करे कि प्रतिनिधि कौन हैं? सम्मान के साथ कहना चाहता हूं कि ऐसा क्लब के चुनाव में भी नहीं होता।
‘उन्होंने कहा, ‘मैं आपसे (मिस्त्री से) आग्रह करता हूं कि निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिये सूची प्रकाशित की जाए।’ तिवारी ने कहा कि अगर कोई चुनाव लड़ना चाहता है और यह नहीं जानता कि प्रतिनिधि कौन हैं तो वह नामांकन कैसे करेगा क्योंकि उसे 10 कांग्रेस प्रतिनिधियों की बतौर प्रस्तावक जरूरत होगी।
उन्होंने कहा कि 10 प्रस्तावक नहीं होंगे तो नामांकन खारिज हो जाएगा। उधर, कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के बारे में विचार कर रहे पार्टी सांसद शशि शरूर ने तिवारी से सहमति जताते हुए कहा कि हर किसी को पता होना चाहिए कि कौन मतदान कर सकता है।
उन्होंने तिरुवनंतपुरम में संवाददाताओं से कहा, ‘मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है कि निर्वाचन सूची को लेकर पारदर्शिता होनी चाहिए। अगर मनीष ने इसके लिए पूछा है तो मुझे भरोसा है कि हर कोई इससे सहमत होगा।
हर किसी को जानना चाहिए कि कौन नामित कर सकता है और कौन मतदान कर सकता है।’कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने भी तिवारी की राय का समर्थन किया और कहा कि हर चुनाव के लिए अच्छी तरह से परिभाषित निर्वाचक मंडल होना चाहिए।उन्होंने ट्वीट किया, ”हर चुनाव में सही ढंग से परिभाषित और स्पष्ट निर्वाचक मंडल होना चाहिए।
निर्वाचक मंडल तय करने की प्रक्रिया भी स्पष्ट, सही ढंग से परिभाषित और पारदर्शी होनी चाहिए। अनौपचारिक निर्वाचक मंडल कोई निर्वाचक मंडल नहीं होता।’चिदंबरम ने कहा, ‘हर क्षेत्र में प्राइमरी होनी चाहिए, लेकिन इसके लिए परिभाषित और पारदर्शी सदस्य सूची जरूरी है। आज हम सदस्यों की संख्या का दावा करते हैं, लेकिन किसी ने इसे सत्यापित नहीं किया है।’
CWC बैठक में भी उठे सवाल –
हाल ही में आयोजित हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी में भी चुनाव की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। तब पार्टी के वरिष्ठ नेता शर्मा ने कहा था कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के करीब 9 हजार प्रतिनिधियों पर कोई स्पष्टता नहीं है।
कुछ दिनों पहले ही उन्होंने हिमाचल प्रदेश में पार्टी की संचालन समिति से भी इस्तीफा दे दिया था। खास बात है कि जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे के बाद कांग्रेस में सियासी हलचल तेज हो गई है।
चुनाव प्रक्रिया पर कांग्रेस का क्या कहना है –
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में पार्टी की CEA प्रमुख मधुसूदन मिस्त्री ने कहा कि मतदाता सूची को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा था, ‘प्रदेश कांग्रेस कमेटियों के पास मतदाता सूचियां हैं।
जो इन्हें देखना चाहते हैं, वह वहां संपर्क करें। दूसरा, जो नामांकन दाखिल करना चाहते हैं… हम उन्हें यह उपलब्ध करा देंगे। यह आम जनता के लिए नहीं है। यह संगठन का चुनाव है, हमारे सदस्य इसे ले सकते हैं। यह हमारी संपत्ति है।’
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