विदेशों में पढ़ाई जाती है इस गांव के विकास की कहानी, बेटी के जन्म पर लगाए जाते हैं 111 पेड़

राजस्थान के राजसमंद जिले का पिपलांत्री गांव की कहानी बिल्कुल अनूठी है. लगभग ढाई हजार की आबादी वाले इस गांव में बेटी के जन्म पर परिवार के लोग 111 पौधे लगाते हैं. यह परम्परा डेढ़ दशक से चली आ रही है. पर्यावरण रक्षा की अनोखी मिसाल की शुरूआत यहां के तत्कालीन सरपंच श्यामसुंदर पालीवाल ने की थी. बेटी की मौत से टूटे पालीवाल ने उसकी याद में इसकी शुरूआत की और इससे अब पूरा गांव ही नहीं, बल्कि आसपास के गांव भी जुड़ चुके हैं.
पथरीली थी जमीन
डेढ़ दशक पहले पिपलांत्री गांव पथरीला था. संगमरमर की खदानों के चलते यहां पेड़ पौधों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा था. जब से बेटियों की याद में यहां पौधे लगाने की शुरूआत हुई, तब से यहां की किस्मत ही बदल गई. अब यह क्षेत्र हरियाली से पूरी तरह आच्छादित हो चुका है.
संतान की तरह देखभाल करते हैं पेड़ों की
जो पेड़ लड़की के जन्म पर लगाए जाते हैं, उनकी देखभाल उसकी लकड़ी का परिवार ही करता है. योजना के अनुसार जब तक लड़की की ब्याह-शादी की उम्र होगी, पौधे पेड़ बनकर तैयार हो. इन पेड़ों से होने वाली आय से लड़की की शादी की जाएगी. साथ ही बालिका के जन्म पर पंचायत उनके लिए एक सावधि जमा की स्थापना करती है. इतना ही नहीं उसके माता-पिता से एक कानूनी हलफनामे पर हस्ताक्षर कराया जाता है कि वो अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा देगें. यही नहीं जब किसी घर में किसी मृत्यु होती है तो उसकी स्मृति में भी पेड़ लगाने की यहां परंपरा है.
10 लाख से अधिक पेड़ लगाए गए
पिछल 15 सालों में यहां के ग्रामीणों ने आम चारागाह भूमि पर करीब 10 लाख पेड़ लगे हैं. जिस तरह किसी लड़की लालन-पालन किया जाता है, उसी तरह इन पेड़ों का किया जाता है. दीमक जैसे कीटों से बचाने के लिए ग्रामीणों ने इन पेड़ों के चारों ओर 25 लाख से अधिक एलोवेरा के पौधे लगाए हैं. वृक्षारोपण से गांववालों की आजीविका भी बढ़ी है.
विदेशों में पढ़ाई जाती है गांव की कहानी
पिपलांत्री गांव की कहानी विदेशों में पढ़ाई जाती है. डेनमार्क सरकार के लिए यह गांव किसी अजूबे से कम नहीं है. इस गांव की कहानी डेनमार्क के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई जाती है. डेनमार्क से मास मीडिया यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स यहां स्टडी करने आते हैं.
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